Tuesday, 6 February 2018

।। साझा करने आयी मुझसे रातों की अकेली आज निशा ।।


हलचल पल-पल है मनोदशा
तम के दलदल में कहीं धँसा
है उथल-पुथल करवट लेती   
भारी गुजरेगी आज निशा
दस्तक देती मेरे चौखट 
धीरे से पुकारे नाम मेरा 
साझा करने आयी मुझसे 
रातों की अकेली आज निशा ।।

आँखें ना मूंदें उजियारा
चादर ओढ़े जो हटा दिया 
सब झूठे-मुठे जतन करूँ 
निद्रा ने ऐसा दगा दिया 
जग को मीठे सपनों में रमा 
बैठी मेरे संग लिए सुरा 
जाने किस जश्न में है बैठी 
रातों की महफ़िल सजा लिया 
कहती जीले संग रात्रि मेरे 
फिर सुबह मिले ना मिले भला 
साझा करने आयी मुझसे 
रातों की अकेली आज निशा ।।

Saturday, 13 January 2018

।। प्रकृति की गोद में ।।

जा क्षितिज लगा है ये दिनकर
शीतल मन चन्दन छाँह बिछे
क्रोधित सृष्टि का ज्वलित ज्वार
कम हुआ नरम व्यवहार दिखे
ज्यों आत्मज के रूखेपन पे
माँ की ममता आभार दिखे
सबको आँचल में छुपा लिया
जो सहमा-सा सँसार दिखे।।

दिन बना कुम्हार अजा सबका
गढ़ता जीवन भरता सबमें
माटी के बने निर्जीवित हम
दे ठोंक-पीट गढ़ता हमने
दिन भर के कठिन परिश्रम में
जब दबा-दबा सँसार दिखे
रजनी का चादर ओढ़ा दिया
जो सहमा-सा सँसार दिखे।।

जननी औ जनक का भार लिये
वाहक सारा परिवार लिये
दिन भर हमपर बरते गरमी
हर रात्रि न्योछावर प्यार दिये
देती हमको दीक्षा सारी
हर सीख जिसे सत साल जियें
सर्वस्व उपस्थित सर्वभूत
सबपर अपनी है नेत्र किये
बल से परिपूर्ण बुद्धि विकसित
मनु के वंशज का मार्ग दिखे
पालक बनके सब जता दिया
जो सहमा-सा सँसार दिखे।।

मनु-रूपा के समागम से
मानवता बरसी इस वसुधा
सृष्टि ने उठाया गोद हमें
भर-पूर दिया सब सुख-सुविधा
जो उदर भरे फल-फूल दिया
जो देह ढके वो धूल दिया
जीजीविषता को तूल दिया
जो हर मौसम अनुकूल दिया
है आज दिया सब उसका ही
जो छत ऊपर विस्तार दिखे
सबको आँचल में छुपा लिया
जो सहमा-सा सँसार दिखे।।

जो आज साँझ को देख मुझे
सृष्टि की दया की बात मझी
दिनभर के कौतूहल से अलग
सुख रात्रि समां सौहार्द लगी
थककर जब रात ने लेप किया
आँखों की सकल तब प्यास बुझी
सपनों की सुन्दर घाटी में
मुझको अम्बर उजियार दिखे
सबको आँचल में छुपा लिया
जो सहमा-सा सँसार दिखे।।






















द्वारा - अविलाष कुमार पाण्डेय
दिनाँक - १३. ०१. २०१८

Friday, 5 January 2018

।। टुटा पत्ता - The broken Leaf ।।



है टूट गिरा आधार मेरा
सब छूट गया परिवार मेरा
अब सफ़र अकेला राह मेरी
तरु से टुटा व्यवहार मेरा।।


गिरते-उड़ते तरु शाखों से
आफ़त ने लिया है घेर मुझे
प्रतिघात हवा ने बरसाये
सब अपना साधे बैर मुझे
निर्बल सहता मैं वार सभी 
छूटा है अभी जो घर मेरा 
अब सफ़र अकेला राह मेरी
तरु से टुटा व्यवहार मेरा।। 


जो रश्मि मुझे मनभावन थी 
तरुघर के झरोखों से आती 
हर रोज मुझे छु करके जब 
मेरे गालों पे इठलाती 
छुपती वो कभी तो कभी-कभी 
एकदम से नेत्र नहा जाती 
स्मृत करके वो अठखेली 
मेरी आँखें भी झर जातीं 
उन धुप की किरणों ने हँसकर  
बरसा डाला अंगार निरा 
अब सफ़र अकेला राह मेरी
तरु से टुटा व्यवहार मेरा।।


कर शक्ति प्रदर्शन हवा मुझे 
नद्-दरिया में अब छोड़ गयी 
पर्वत-सम ऊँचे धार चढ़ा 
लहरें भी मेरा दम तोड़ गयीं 
खुद की ऐसी क्षति देख मुझे 
दुर्गति भी चिढ़ा मुँह मोड़ गयी 
एकलता का ऐसा मुझपर 
भरी-भरकम है पहाड़ गिरा 
अब सफ़र अकेला राह मेरी
तरु से टुटा व्यवहार मेरा।।


तरु से लिपटे मैंने कितने 
सावन की रिम-झिम खूब जिया 
बौछारों की मधुरिम वर्षा में 
तन-मन अपना भीग लिया 
तरु के विस्तृत आँगन में सब 
जीवन के अपने कृत्य किया 
छोटे कोंपल से पत्ते तक
सब सफ़र यहीं पर सिद्ध किया 
अब छोड़ चला जब इस घर को 
सब बैरी है संसार मेरा 
अब सफ़र अकेला राह मेरी

तरु से टुटा व्यवहार मेरा।।


द्वारा- अविलाष कुमार पाण्डेय 
दिनाँक- ०६. ०१. २०१८ 

Saturday, 30 December 2017

।। जीवन मैं निरन्तर राह तेरी, जिस ओर चली उस ओर चला ।।


टूटे हिम्मत को जोड़ चला 
हाँ धैर्य बाँध पुरजोर चला 
सम्मुख मेरे चट्टान अडिग 
गिरते-पड़ते पथ ओर चला 
जीवन मैं निरन्तर राह तेरी 
जिस ओर चली उस ओर चला ।।

जीवन पथ भी कुछ है ऐसा 
जो चले निरन्तर चाल नयी 
सोची-समझी तैयारी की 
ना इसमें कोई कमाल नहीं 
बस खोल छोड़ दे नद्-धारा 
बहकर चलदे इस सागर में 
लघुता में तेरी निज हानि है 
सब भरलें तुझको गागर में 
हर बन्द द्वार तू खोल सभी 
अंधे मन-मन्दिर दीप जला 
जीवन मैं निरन्तर चाल तेरी 
जिस ओर चली उस ओर चला ।।

मैं राह में तेरी चल निकला 
कुछ चाह लिये अंतर्मन में 
निज भोर-रश्मि जा शाम ढले 
कुछ तो पा लूँगा जीवन में 
ना मिटें कदम जो चाप दिये 
धूलि में तेरी हमने चलके 
ना भार का कोई काम नहीं 
तुझको है लिया हमने हलके 
चल दी है तेरी मझधारों में 
हिम्मत को मेरी पतवार बना 
जीवन मैं निरन्तर चाल तेरी 
जिस ओर चली उस ओर चला ।।

कुछ साथ मेरे थे छूट गये 
राहों के जटिल वीरानों में 
आगे कश्ती है रिक्त मेरी 
टकराये जो तूफ़ानो से 
ना भरमा सकती है मुझको 
मंजिल मेरी बढ़ पाने से 
ये दौर मेरा है, तेरा नहीं 
कुछ ना होगा भरमाने से 
चलना है तुझ संग पार क्षितिज 
चल चले चलें अब कदम मिला 
जीवन मैं निरन्तर चाल तेरी 
जिस ओर चली उस ओर चला ।।




द्वारा - अविलाष कुमार पाण्डेय 
दिनाँक - ३०. १२. २०१७ 

Sunday, 3 December 2017

।। आवारा बादल ।।

है भरा-भरा उन्माद धरा
हर दिवस वही है चहल-पहल
हर वार भीड़ में दबा हुआ
बीते हर आने वाला कल
सिमटा सँकरा आश्रय तेरा
मैं हिस्सा इसका एक अटल
है कर्मभूमि ये शहर मेरा
मैं  इसका आवारा बादल।।

मँडराते मेघ सम मैं भटकूँ
अम्बर वृस्तित है पटल तेरा
सीधा, सपाट ना समतल तूँ
ऊँचा-नीचा, सँकरा, गहरा
तेरे ज्वार-भाट में बहे चलूँ
वारिद बूँदें जो दें नहला
झंझावात निस दिन देख तेरे
हिय का कोना-कोना दहला
कम पड़ जाये ये छत तेरी
जब ताप गिरे रवि-रश्मि विरल
है कर्मभूमि ये शहर मेरा
मैं  इसका आवारा बादल।।

लहरों पे मचलते शहर में इस
पतवार धरे हैं कुछ मैंने
हैं शक्ति समेटे सब मिलकर
मझधार तरे हैं कुछ मैंने
मुस्कान में कुछ, कुछ नमी-नमी
हर शाम भी ढल ही जाती  है
लड़ते-लड़ते मझधारों से
तकरार जमाई है मैंने
एक दिन उभरेगी परछाई
सँकरी गलियों को चीर निकल
है कर्मभूमि ये शहर मेरा
मैं  इसका आवारा बादल।।

लूटी है बहुत खुशियाँ  मैंने
बेबाक शहर की महफ़िल में
कुछ लूट लिया इसने मुझको
बेमानी भी इस सङ्गदिल में
लाखों हैं खड़े सड़कों पे मगर
सब तन्हा अपनी मंजिल में
ना ख़बर किसी को कोई यहाँ
दीवार बँधी है हर दिल में
अनदेख गुज़र जाता हूँ मैं
बिन पूछे तेरा हाल निकल
है कर्मभूमि ये शहर मेरा
मैं इसका आवारा बादल।।

बदले इसका चेहरा हर छण
प्रतिपल बढ़ता आकार नया
परिवर्तित करदे अपने सम
पड़ती जिसपे इसकी छाया
सब बौंर-बाग़ कर दिये ख़तम
हर गाँव को बस्ती बना दिया
अब शहर मेरा विस्तृत इतना
आधार को अपने जला दिया
बढ़ती आबादी भार तले
बदली काया है आज पटल
है कर्मभूमि ये शहर मेरा
मैं  इसका आवारा बादल।।


द्वारा- अविलाष कुमार पाण्डेय
दिनाँक - ०२. १२. २०१७





Friday, 17 November 2017

।। कल धुप मिलेगी राहों पर ।।


आ शौर्य बना आवरण तेरा
चल निकल पड़ें बस राहों पर
मन में ना रख सन्देह कोई
अपनी इन लौह-भुजाओं पर
मिलती मंजिल ना पथिक कभी
घर की दरख़्त की छाहों पर
जल जाये आज तो फिकर नहीं
कल धुप मिलेगी राहों पर ।।

डर जलने का तू त्याग अभी
जीवन की अग्नि-परीक्षा में
सोया राही तू जाग अभी
अपने मन-शक्ति समीक्षा में
झूठा हठ मन से त्याग अभी
इस नए दौर की शिक्षा में
हर ज्ञान का करले जाप अभी
इस मन-मन्दिर की इच्छा में
हर राह की डगर है खुली अभी
कौतुहल है चौराहों पर
जल जाये आज तो फिकर नहीं
कल धुप मिलेगी राहों पर ।।

चल कदम ताल से ताल मिला
है आज प्रदर्शन की बारी
तू इस समाज की ताक़त है
कन्धों पे लिये ज़िम्मेदारी
है युवा अटल तू पर्वत-सा
स्थिर, अभेद पहरेदारी
तू बढ़ आगे अनुसरण करें
सब वृद्ध, व्यस्क और नर-नारी
है शक्ति-सबल तू कर्म-निपुण
सब देखे तुझे निगाहों पर
जल जाये आज तो फिकर नहीं
कल धुप मिलेगी राहों पर ।।

मूर्छित समाज की आस है तू 
आधार है तेरी भुजाओं में 
काया कुटुंब की बदलेगी 
संकल्प उठा इन राहों में 
जन्मा मनुष्य का अंश है तू 
विश्राम तुझे ना छाहों में 
हे युवा! निकल तू राह बना 
हर दृष्टि है तेरी भुजाओं पर 
जल जाये आज तो फिकर नहीं
कल धुप मिलेगी राहों पर ।।


कल धुप खिलेगी नयी-नयी
उसमे झलकेगा शौर्य तेरा
उज्जवलित सृष्टि की चमक में तू
हर रश्मि में होगा अंश तेरा
ये नव-समाज स्थापित हो
जिसके स्तम्भ में तू हो भरा
आधारभूत जिसकी हो अडिग
निर्माण भव्य हो वृहत नीरा
तेरी बातें दोहरायें सभी
आदर्श-पथिक की यादों पर
जल जाये आज तो फिकर नहीं
कल धुप मिलेगी राहों पर ।।


द्वारा- अविलाष कुमार पाण्डेय 
दिनाँक - १७. ११. २०१७ 

Saturday, 4 November 2017

।। सौंदर्य ।।

हिय हर्ष उठा रे कजरारी
नयनों में तेरी जो छाप पड़ी
सौंदर्य रूप श्यामल तेरा
विह्वल मन-तार तरँग उठी
मन-विहग राग में चहक उठे
उपवन-मन कलियाँ भी मँहकी
चन्दन वर्षा आनंद मिले
जो तूँ  निहार कर मुझे चली।। 

चन्दन-सी पवन तुझसे आकर
मेरे अत्र-तत्र वारिद छाये
मन महक उठा आनन्दित हो
प्रियतम तुम जब सम्मुख आये
मन किंकर्तव्यविमूढ़ मेरा
हलचल व्याख्यान ना कर पाये
प्रतिबन्ध में बँधा है मन मेरा
चक्षुओं में तेरी झाँके जाये
भ्रम-भौंर सी गहन नज़र तेरी
मद मस्त ये मन बहका जाये 
ना रोक सकूँ खुद को निर्बल 
आकर्षण ज़ाल  में फँस जाये 
स्वातंत्र्य मेरा छीना तुमने 
हिय को अपने संग बाँध चली 
चन्दन वर्षा आनंद मिले
जो तूँ  निहार कर मुझे चली।। 

जो फूट पड़े हिय-गीत मेरे 
हिय से बंधन बांधे जाये 
मधुरिम वर्षा की तरंगों में 
गीला मन नम हो बह जाये 
बहकर मन स्वपन की धार मेरे 
तेरे सानिध्य को पा जाये 
करके प्रहार मन विवश करे 
मोहक भावों की गिरी बिजली 
चन्दन वर्षा आनंद मिले
जो तूँ  निहार कर मुझे चली।। 

पाया तुमने जो रूप-कुम्भ
 ना-ना प्रकार के गुणों भरे 
हो बाह्य आवरण भी जिसमें 
श्रृंगार रूप पाकर निखरे 
हर एक भाग में कला तेरी 
किस ओर से व्याख्या शुरू करें 
आँखें मधु मद में मनमायी 
इस दृश्य की साक्ष्य हैं नेत्र मेरे 
तेरे रूप-सोम की मादकता 
मेरे अम्बर पे अब घोर चली 
चन्दन वर्षा आनंद मिले
जो तूँ  निहार कर मुझे चली।। 

गन्धर्व, नाग तू सर्वोपरी 
तू जहाँ-जहाँ पग धार चले 
हों पाप-मुक्त नर सभी वहाँ 
गँगा जैसी तू धार चले 
अर्पण करके तुझे देह मेरी 
परलोकी मन ये सिधार चले 
अंधी रातों का पतंग ये मन 
आगे क्या जाने प्राण चले 
तुझसा लव-दीपक पा करके 
अस्तित्व मेरा हर रात जले 
मेरे रोम-रोम में गढ़ी जो तुम 
हिय से पुकार सत बार चली 
चन्दन वर्षा आनंद मिले
जो तूँ  निहार कर मुझे चली।। 


द्वारा - अविलाष कुमार पाण्डेय 
दिनाँक - ०४ .११.२०१७